20 जुलाई 2013 - 19:30
एक बड़ा ख़तरा

एक ख़तरनाक चीज़ जो रूहानी व आध्यात्मिक सफ़र में आगे बढ़ने में रुकावट बनती है और क़ुरआनी आयतों और हदीसों में उससे बचे रहने को कहा गया है, ख़ुद को बड़ा समझना है, यह एक ख़तरनाक चीज़ है। इसे क़ुरआन और हदीस की ज़बान में तकब्बुर अर्थात घमण्ड कहा जाता है।

एक ख़तरनाक चीज़ जो रूहानी व आध्यात्मिक सफ़र में आगे बढ़ने में रुकावट बनती है और क़ुरआनी आयतों और हदीसों में उससे बचे रहने को कहा गया है, ख़ुद को बड़ा समझना है, यह एक ख़तरनाक चीज़ है। इसे क़ुरआन और हदीस की ज़बान में तकब्बुर अर्थात घमण्ड कहा जाता है। घमण्ड यानी ख़ुद को, अपने काम को, अपने अमल को, अपने इल्म को, अपनी विशेषता को बड़ा और ज़्यादा समझना है। कहा जा सकता है कि इन्सान की रूहानी तरक़्क़ी में एक बहुत बड़ी बीमारी यह है कि इन्सान ख़ुद को दूसरों से बड़ा, अच्छा, पाक, ताक़तवर और महान समझे।क़ातिले ज़हरघमण्ड की एक पहचान यह है कि इन्सान ख़ुद को दूसरों से बड़ा समझता है। यह बड़ी अजीब और ख़तरनाक चीज़ है। क़ुरआने करीम में इसे कई शब्दों के साथ बयान किया गया है और मोमिन को इससे बचने को कहा गया है। जैसे अगर किसी के पास इल्म हो और वह केवल ख़ुद को पढ़ा लिखा और आलिम समझे और बाक़ी सभी लोगों को अनपढ़ और गँवार कहे। या हर चीज़ को अपने इल्म की ऐनक से देखे जो उसके इल्म के दायरे में आता हो उसी को माने और जो उसे समझ में न आता हो या सकी सोच के विरुद्ध हो, उसे न माने तो यह घमण्ड है। घमण्ड की बीमारी उन लोगों को भी लग सकती है जो ख़ुदा की इबादत करते हैं, दुनिया की ओर ज़्यादा ध्यान नहीं देते और ज़ाहिद बन कर रहते हैं, उन्हें होशियार रहना चाहिये, अपनी इबादत पर घमण्ड करना, उसे बहुत कुछ समझना, ख़ुद को इस लेहाज़ से दूसरों से बड़ा समझना, यह उनका घमण्ड है। किसी को रमज़ान में और शबे क़द्र में इबादत, नमाज़, दुआ और दूसरी चीज़ों की तौफ़ीक़ मिले और बड़े अच्छे तरीक़े से सब कुछ करे लेकिन वह लोग जिन्हें तौफ़ीक़ नहीं मिली या उस तरह से नहीं कर सके जिस तरह उसने किया है, अगर उसके दिल में यह ख़्याल आए कि मैं उनसे अच्छा हूँ तो यह घमण्ड है, इस से उसके सारे आमाल और इबादत बर्बाद हो जाएंगे। हम जैसे लोगों के जीवन में छोटी छोटी चीज़ों में यह बीमारी जाती है लेकिन जो बड़े रुतबे वाले होते हैं, जो रूहानियत में कहीं पहुँचे होते हैं उनके लिये ज़्यादा ख़तरा है। अगर उनके अन्दर यह बीमारी आ जाए तो ज़्यादा ख़तरनाक है।ख़ुद को तोड़नाजब इन्सान ख़ुदा के रास्ते में आगे बढ़ना चाहता है तो उसके लिये ज़रूरी है कि ख़ुद को छोटा समझे, बल्कि कुछ भी न समझे। इन्सान के पास इल्म, ताक़त, दौलत, रुतबा सब कुछ हो लेकिन वह यह न समझे कि मेरे पास कुछ भी नहीं है, यह बहुत बड़ी चीज़ है इसके लिये ख़ुद को तोड़ना पड़ता है, यह चीज़ आसानी से हाथ नहीं आती, इसके लिये प्रैक्टिस की ज़रूरत है। आयतुल्लाह मीरज़ा तबरेज़ी जो कि अपने ज़माने के एक महान आलिम और आरिफ़ थे उनके बारे में, मैंने सुना है कि जब वह नजफ़ पढ़ने गए तो वहाँ वह अमीर लोगों की तरह रहा करते थे। एक नौकर हमेशा उनके साथ होता ता, बढ़िया कपड़े पहनते क्योंकि वह बड़े घर से थे, उनके बाप तेहरान के बहुत बड़े व्यापारी थे। नजफ़ में जब उन्होंने अच्छी ख़ासी पढ़ाई कर ली तो उस समय के मशहूर आलिम मुल्ला हुसैन क़ुली हमदानी (जो अख़लाक़ का दर्स दिया करते थे और बड़े बड़े आलिम उनके दर्स में जाया करते थे) के पास गए ताकि उनसे कुछ रूहानी चीज़ें सीखें। जब मीरज़ा जवाद उनके द्वार पर पहुँचे तो मुल्ला हुसैन क़ुली नें उनसे कहा, वहीं बैठ जाओ जहाँ जूते रखे हैं, उन्हें अच्छा तो नहीं लगा लेकिन वह वहीं बैठ जाते हैं, इसी तरह कई दिन गुज़र जाते हैं और मीरज़ा जवाद रोज़ बैठते हैं, एक दिन क्लास के बाद मुल्ला हुसैन क़ुली उनसे कहते हैं यह हुक़्क़ा लो और इसमें पानी भर के, तम्बाकू डाल कर मेरे पास ले कर आओ। वह हुक़्क़ा लेकर बाहर आते हैं लेकिन सबके सामने यह काम करने में वह अपना अपमान समझते हैं। अपने नौकर को बुलाते हैं और उसे हुक़्क़ा भरने को कहते हैं। नौकर हुक़्क़ा भर के लाता है और उन्हें देता है। वह उसे लाकर सबके सामने अपने उस्ताद को देते हैं। मुल्ला क़ुली उनसे कहते हैं- मैंने कहा था कि तुम ख़ुद यह काम करो नाकि नौकर से करवाओ। मुल्ला हुसैन क़ुली इस तरह मीरज़ा जवाद तबरीज़ी के घमण्ड को तोड़ते हैं और इस तरह मीरज़ा जवाद रूहानियत में सबके उस्ताद बन जाते हैं। तो सबसे पहला क़दम अपने घमण्ड को तोड़ना है, अपने अन्दर के फ़िरऔन को पराजित करना है। दुनिया की सारी बुराइयां, अत्याचार, ऊँच नीच, जंगें, ख़ून ख़राबा, वह काम जिनसे इन्सानों का जीना हराम हो गया है, यह सब कुछ इसी घमण्ड, इसी मैं (अहंकार) और इसी फ़िरऔन के कारण है जो हम सब के अन्दर है। अगर हमने इसे कंट्रोल नहीं किया और इसकी लगाम अपने हाथ में न ली तो बहुत ख़तरनाक होगा। यह केवल अपने लिये नहीं बल्कि दूसरों के लिये भी ख़तरनाक है। इसका जितना असर ख़ुद इन्सान पर है उतना ही उसके आस पास के लोगों और सुसाईटी पर भी है। इसका असर इतना है कि, ख़ुद तो डूबे हैं तुमको भी ले डूबेंगे। इसलिये क़ुरआने मजीद फ़रमाता है-’’أَلَيْسَ فِي جَهَنَّمَ مَثْوًى لِّلْمُتَكَبِّرِينَ‘‘घमण्ड करने वालों का स्थान जहन्नम (नरक) है। फ़िरऔन इसी घमण्ड के कारण जन्म लेता है। किसी को हुकूमत मिलती है, कोई बादशाह बनता है, कोई किसी बड़ी पोस्ट पर पहुँचता है तो अकड़ने लगता है, ख़ुद को बहुत कुछ बल्कि सब कुछ समझने लगता है, जबकि मालूम है कि एक दिन कुछ भी न रहेगा। इन्सान एक दिन बादशाह होता है लेकिन कुछ ही सालों बाद सब कुछ ख़त्म हो जाता है और उसको कोई पूछने वाला नहीं होता। घमण्ड का कारण क्या होता है? घमण्ड का कारण यह होता है कि इन्सान ख़ुद को धनवान समझे, वह यह समझे कि वह सब कुछ है और उसे किसी और की ज़रूरत नहीं है यहाँ तक कि ख़ुदा की भी नहीं। क़ुरआने करीम इस चीज़ को सूरए अलक़ की इस आयत में बयान करता है-’’كَلَّا إِنَّ الْإِنسَانَ لَيَطْغَى۔أَن رَّآهُ اسْتَغْنَى ‘‘(سورہ علق6-7-)इन्सान इस लिये अकड़ता है क्योंकि वह ख़ुद को धनवान समझता है।बहुत से लोग ऐसे भी हैं जिनके पास पैसा, प्रापर्टी, ताक़त, कुर्सी सब कुछ होता है लेकिन फिर भी ख़ुद को कुछ नहीं समझते बल्कि ख़ुद को ख़ुदा से सम्बंधित समझते हैं। इसकी एक मिसाल जनाबे सुलैमान हैं, उनके पास पूरी दुनिया का राज्य था यहाँ तक कि दुनिया की हर चीज़ पर इन्सान, जानवर, जिन, हवा, पानी सब पर उनका राज्य था लेकिन ख़ुद को ख़ुदा का बंदा समझते थे। दुनिया में जितने भी नबियों नें या अल्लाह वालों नें राज्य किया है वह ऐसे ही थे। क़ुरआने मजीद नें क़ारून....... भी दी है उसके पास बहुत ज़्यादा मालो दौलत थी और वह उस पर अकड़ता था, जब उससे कहा जाता था कि तुम अकड़ते क्यों हो, यह सब तो ख़ुदा नें तुमको दिया है तो वह कहता था-’’إِنَّمَا اُوتِیتُه عَلى عِلمٍ‘‘यह सब मेरे इल्म का करिश्मा है। यह दौलत मैंने ख़ुद कमाई है इसलिये यह मेरी है। यह है घमण्ड, इससे बचना चाहिये।